Tuesday, September 23, 2014

शरीफ़ों की शराफ़त

हममें से ज्यादातर लोग खुद को शरीफ़ों की पदवी से नवाजना पसंद करते हैं। लड़की के ब्याह के लिये ना केवल शरीफ़ लड़का अपितु पूरा के पूरा खानदान शरीफ़ तलाशा जाता हैं। हम शरीफ़ मोहल्लों में रहना पंसद करतें हैं। केवल शरीफ़ लोगों से संपर्क रखते है। फ़िल्म या खाना खाने भी वही जगह पर जाना पंसद करतें हैं जहाँ पर शरीफ़ लोग आते जाते है, कुल मिला कर देखा जाये तो आम मध्यमवर्गीय भारतीय आदमी की पूरी जिंदगी शरीफ़ों और शराफ़त के बीच कटती हैं।

बचपन में जब बच्चें शरारत करते है तो माँ बाप ये कह कर डाँटतें हैं कि तुम में शरीफ़ों वाले लक्षण नहीं दिखायी दे रहें। बच्चें जब अपने से थोड़े नीचे स्तर वाले और तन पर गंदे कपड़े पहने हुए बच्चों के साथ खेलते हैं तो माँ बाप झिड़क कर कान मरोड़तें हुए ले जाकर कहते हैं कि शरीफ़ बच्चों के साथ खेला करो। कंचे, गिल्ली डंडा, पत्ते और ऐसे अनेंको खेल है जिन्हें आधुनिक मध्यम वर्ग शरीफ़ो के खेल नहीं मानता। सबने आस पास शराफ़त का एक माया जाल बुन लिया हैं जहाँ हम अपने आप को ना केवल सुरक्षित मानते है, साथ ही साथ सभ्य और स्वच्छ भी।

वक्त के साथ साथ शरीफ़ शब्द के मतलब में भी बहुत बदलाव आ चुका हैं। बस में या रेल में जब कोई आदमी जबरदस्ती आपकी सीट पर कब्जा कर लेता है तो आप खुद को शराफ़त की दुहाई देते हुए कोई और जगह तलाश लेते हैं, जब आटो वाला ज्यादा पैसे लेने के लिये झिकझिक करता हैं, तो आप खुद को शरीफ़ व्यक्ति समझ झुक जातें हैं। गणेश चतुर्थी और नवरात्रि के समय जब कोई चंदा माँगने आता हैं तो आप ना चाहते हुए भी ज्यादा रुपये दे जाते हैं। बाहर के मंदिर में जब जोर जोर से भजन बजते है तो आप तकलीफ़ें सहते हुए भी चुप रह जाते हैं। शरीफ़ लोग गुंडो के मुँह नहीं लगते, ऐसा सोचते हुए हम तमाम अत्याचार सहते जाते है। बहुत ही वाजिब वजह चुन ली हैं हमनें अपनी कायरता को छुपाने के लिये।

चुनाव के समय जोर जोर से बज रहें लाउडस्पीकर और उसकी आवज से परेशान हो रहे घर के बुजुर्गों और बच्चों को हम ये बोल कर समझा देते हैं कि राजनीति में बस गुंडागर्दी रह गयी हैं, और हम शरीफ़ लोग हैं। यही शराफ़त का पाठ हम अपने बच्चों को पढा कर उन्हें भी कायर बनाते हैं, कोई दूसरा बच्चा उसे तंग करता हैं तो हम उसे यही बोलते हैं की उससे दुर रहा कर, अलग रहा कर, कभी उसे जवाब देना नहीं सीखाते और क्यों सीखायेंगे , हम शरीफ़ लोग जो हैं। बच्चा जब स्कूल में अध्यापकों की दादागिरी और गलत व्यव्हार सहता हैं और कुछ करने का सोचता हैं तो हम उसे यही बोलते है कि कौन सा तुझे उम्र भर यहीं रहना है, बस पढाई पर ध्यान दे और निकल जा यहा से।कमोबश यहीं स्थिति कालेज में रहती है जब बच्चा पहले सीनियर लोगों के अत्याचार सहता हैं और फ़िर प्रोफ़ेसर के अन्याय और यही सोच कर कुछ नहीं कर पाता कि आवाज उठाने के दुष्परिणाम झेलने पड़ेंगे।



शरीफ़ की परिभाषा अब बस सहना मात्र रह गया हैं, हर जुल्म हर अत्याचार हर वो चीज जो गलत हो रही है उसे आँखे मुंद कर देखो, और खुद के शरीफ़ होने की दुहाई दे कर टाल जाओ। फ़िल्मों में ये सीन काफ़ी बार दिखाया गया है जब कुछ ग़ुंडे किसी लड़की को तंग कर रहे हो या फ़िर जबरन हफ़्ता वसूली कर रहे हो तो आम आदमी “ शरीफ़ लोग गुंडो से कैसे भिड़ेंगे” ये सोच कर बस तमाशबीन बने रहते हैं। फ़िल्मों में तो एक हीरो रहता ही हैं जो 10-10 गुंडो को साथ में पिटता है पर असल जिंदगी का क्या ? बसों और ट्रेनों मे जब कोई किसी लड़की को परेशान करता है तो वहाँ पर कोई हीरो नहीं होता बस मूकदर्शक तमाशबीन भीड़ जो चाहें तो किसी को भी रौंद सकती है पर चाहने की ईच्छाशक्ति ही नही हैं। मैं क्यूँ किसी के झगड़ें में टाँग फ़साँउ, मेरा क्या लेना देना, यह सोच कर हम आगे बढ़ जाते हैं।

पर क्या इतना निश्चिंत होना सही हैं ? हो सकता है , कल आपके साथ कुछ गलत हो, आपसे हफ़्ता वसूली की जाने लगे, आपके मकान पर कब्जा हो जाये, आप ठगी के शिकार हो जायें, तब भी आप शराफ़त के पुतले बने रहेंगे, तब आप लड़ेंगे और पूरी दुनिया को गाली भी देंगे की आपका साथ कोई नहीं दे रहा, कोई आपके साथ नहीं लड़ रहाँ जबकी आप सही हैं। पर दुनिया को क्यों दोष देना, दुनिया भी आप ही की तरह शरीफ़ हैं, और दुसरों के झगड़ो से दूर रहना पंसद करती हैं। हम सब शराफ़त की आड़ में कायर बन बैठें है, और अपने बच्चों को भी वैसा ही बना रहे हैं, आँख मूंद कर सोने का नाटक भर कर रहे है ताकि कोई लाख चाहे तो भी जगा ना सके।

शरीफ़ वो होता है, जो दुसरो को तंग नहीं करता, दुसरे का बुरा नहीं करता, पर जब बात खुद पर आ जाये तो व्यक्ति को आवाज उठाना पड़ती है, लड़ना भी पड़ता है, मार खानी भी पड़ती हैं और मारना भी पड़ता है। शरीफ़ होने का मतलब दब्बु और कायर होना बिल्कुल भी नहीं है। अपमान का घुट पी कर चुप रह जाना और जो भी गलत हो रहा हैं उसे सहना आपका मजबूर होना साबित करता है शरीफ़ होना नहीं। शराफ़त और कायरता में एक व्यापक पैमाने पर अंतर हैं। अगर आप अपने या अपने किसी अजीज के लिये आवाज उठाते है और लड़ते है तो आपसे आपका शराफ़त का तमगा छीन कर आपको झगड़ालु और गुंडा घोषित नहीं कर दिया जायेगा वरन आप लोगो की नजरों में और उपर उठ जायेंगे और आप खुद की नजरों में से गिरने से भी बच जायेंगे।

तो अगली बार जब कुछ गलत होते हुए दिखाई दे तो उसे सहने या नजरअदांज करने के बजाएँ लड़िये और आवज उठाईयें और सबके लिये एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कीजिए । शरीफ़ बनियें कायर नहीं। दुष्यंत कुमार की इस कविता के साथ आपसे विदा लेता हुँ।
कुछ भी बन बस कायर मत बन,
ठोकर मार पटक मत माथा तेरी राह रोकते पाहन।
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

युद्ध देही कहे जब पामर,
दे न दुहाई पीठ फेर कर
या तो जीत प्रीति के बल पर
या तेरा पथ चूमे तस्कर
प्रति हिंसा भी दुर्बलता है
पर कायरता अधिक अपावन
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

ले-दे कर जीना क्या जीना
कब तक गम के आँसू पीना
मानवता ने सींचा तुझ को
बहा युगों तक खून-पसीना
कुछ न करेगा किया करेगा
रे मनुष्य बस कातर क्रंदन
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

तेरी रक्षा का ना मोल है
पर तेरा मानव अमोल है
यह मिटता है वह बनता है
यही सत्य कि सही तोल है
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को
न कर दुष्ट को आत्मसमर्पण
कुछ भी बन बस कायर मत बन।  


Thursday, September 11, 2014

मौत तू एक कविता है

‘मौत’, जीवन की शाश्वत सच्चाई, एक ऐसी सच्चाई जिसका सामना करने से हर पल हम भागते रहते है। एक कटु सत्य जिसके बारे में हम बात तक करना पंसद नहीं करते, एक ऐसा मंजर जो हर बार हमे अंदर तक दहला देता है। कमोबश, हम में से हर किसी ने किसी ना किसी रूप में मौत को महसूस कर लिया हैं और हर किसी का अहसास दूसरे से जुदा हैं, हम सब के लिये मौत की अलग अलग परिभाषा हैं और अलग अलग द्र्ष्टिकोण, पर जिंदगी के हर मोड़ हर पड़ाव पर मौत साथ साथ चलती है और हम उसे झुठलाने का असफ़ल प्रयत्न करते रहते हैं।

वैसे तो मैं खुद को अभी उस मुकाम पर नहीं पाता की इतने संवेदनशील विषय पर कुछ लिख सकूँ पर हालही की कुछ घटनाओं ने मजबूर कर दिया। सबसे पहले मेरे पंसदीदा कलाकार और जाने माने अभिनेता ‘राबिन विलयम्स’ का आत्महत्या करना अंदर तक झकझोर गया, जो इंसान खुद अपनी फ़िल्मों में जीने का संदेश देता था, वो खुद अंदर से इतना कितना तन्हा और कुंठित था की ऐसा कदम उठा गया ? ज़िसे ना दौलता की कमी हो, ना शौहरत की और काम भी अपने मन का कर रहा हो, तो क्या कारण रहे होंगे उसके दुनिया को छोड़ने का फ़ैसला करने के ?

अभी कुछ दिनों से मैं अमेरिका का मशहुर टीवी सीरियल ‘केलिफ़ोर्निकेशन’ देख रहा था। उसमें एक किरदार ‘ल्यू ऐशबी ‘ था, बहुत ही जिंदादिल आदमी जो जीवन के हर पल को जीता है वो भी अपने पैमानो से, जिसके लिये जीवन एक पार्टी भर है जहाँ जितना मजा करना हैं कर लो। इस जिंदादिल आदमी का एक उदास और संवेदनशील पहलू भी है, उसकी प्रेमिका जो एक बहुत ही अमीर आदमी की पत्नी है और उसके लाख कोशिश करने पर भी अब उससे कोई ताल्लुक नहीं रखती, पर सीरियल के मुख्या किरदार ‘हैंक मूडी’ के मनाने पर उससे मिलने आती है। शायद पूराने प्यार का सुरूर होंगा या फ़िर अपनी पूरानी गलतियों की ग्लानि, ल्यू सहज रूप से उससे मिलने नहीं जा पाता । हैंक के जोर देने पर वो मिलने के लिये तैयार तो हो जाता है, पर जाने से पहले वो बहुत सारा हेरोईन कोकेन समझ कर ले लेता है, परिणामस्वरूप उसकी मौत हो जाती है। बड़ी ही अजब विंडबना हैं, ऐसा व्यक्ति जिसके पास दौलत और शोहरत दोनों हैं, और बाहर से वो जिंदगी के हर तरह से मजे लेता हुआ दिखायी देता है, अंदर से अपने पूराने प्यार को ना पाने के कारण व्यथित हैं और जब वो प्यार उसके दरवाजे पर खड़ा मिलता है तो जिंदगी अपने दरवाजे बंद कर देती है।

इसी सीरियल से मुझे ‘निर्वाणा’ नाम के बैंड के सदस्य ‘कर्ट कोबेन’ का पता पड़ा, जिन्होंने खुदखुशी की थी और पुन राबिन विल्यम्स की मौत के समय जो प्रश्न दिमाग में आया था, वह फ़िर आ खड़ा हुआ। आम आदमी हमेशा दौलत, शोहरत, इज्जत, सफ़लता के पीछे भागता है और इन्हीं की कशमकश में अपना जीवन गुजार देता है, फ़िर क्या कारण होता है सफ़ल लोगो के मौत को गले लगाने को ? हजारों की भीड़ के चहेते होते हुए भी वो भीतर से इतने तन्हा क्यूँ होते है ? हर तरफ़ से इज्जत और सराहना पाने के बावजुद क्या उन्हें हर पल कचोटता रहता हैं कि वो या तो नशे के आदि हो जाते है। सब कुछ होते हुए भी क्या बाकी रह जाता है कि या तो नशा ही जिंदगी बन जाता हैं या नशा ही मौत का कारण या फ़िर जीवन भी एक नशा भर रह जाता है ?



हालही में फ़ेसबुक की भी दो घटनाओं ने थोड़ा मन को छु लिया। मेरे फ़ेसबुक में एक बंदा था, निजी तौर पर नहीं मिला था मैं उससे पर बस यही पर बातचीत थी। बहुत ही जोशिला और जीवटता भरा इंसान था, एक दिन खबर मिली की उसने खुदखुशी कर ली है, कारण तो पता नहीं। थोड़े दिन पहले फ़ेसबुक पर ही उसके जन्मदिन का संदेश मिला, उसकी वाल पर कई लोग बधाई संदेश लिख रहे थे क्यूंकि उसकी मौत की खबर पूरानी हो चुकी थी और बहुतों को पता भी नहीं था की जिस ईंसान को वो सालों जीने का संदेश दे रहे है वो तो पहले ही मौत की गोद में आराम से सो रहा है। ये द्र्श्य बड़ा ही अजीब लगा।

फ़ेसबुक पर ही एक और मित्र थी, थोड़ी वयसक थी, किसी जमाने में बहुत अच्छी बातचीत थी उनसे पर फ़िर अचानक उनके अंकाउट में कुछ दिक्कत की वजह से बातचीत खत्म हो गयी। थोड़े दिन पहले मैने उन्हें वापस से फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेजी और पुन: बात प्रांरभ हुई, जाते जाते वो वादा कर के गयी की अब मुलाकाते होती रहेंगी। 10 दिन बाद ही खबर आयी कि वे बहुत बीमार है और फ़िर उनकी मृत्यु का दुखद समाचार प्राप्त हुआ, मन थोड़ा सा विचलित हो गया। अनेकों लोगो के शोक संदेश देखे और लगा की मौत भी बड़ी अजीब चीज हैं जो लोग सदियो से बात नहीं करते वे भी भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि मौत के समय तो आपके दुश्मन भी आपकी तारीफ़ करने लगते है। किसी समय एक रूसी कहानी पढी थी, एक वैज्ञानिक अपना क्लोन बना कर अपनी मौत का स्वांग गढता है ताकि शोक संदेश में अपनी तारीफ़ पढ सके और इससे पहले की वो अपनी इस अदभुत खोज को दुनिया को बता सके , उसकी बीवी उसे जहर दे कर मार देती है क्योंकि किसी जमाने में अपने अनुंसधान के पीछे पागल हो उसने अपनी बीवी पर थूक दिया था, एक थूक का बदला मौत वो भी जीवन के सबसे रोंमाचक क्षण में जब आपकी सालो की महनत सफ़ल हुई है, बड़ी दिलचस्प कहानी थी।

एक और कहानी याद आ रही हैं एक सरकारी कर्मचारी की जिसका स्थानांतरण एक नक्सली इलाके में कर दिया जाता है और वो अनेक जुगाड़ लगा कर अपना स्थानांतरणीय रुकवाता है क्योंकि उसे डर होता है कि वहा उसे अगवा कर के मार दिया जायेगा। जब वो सफ़ल हो जाता है, तब वो जश्न मनाने के लिये घर मिठाई लेकर जाता है पर दुर्भाग्यवश अगले चौराहे पर एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है। फ़िर से, वही विडंबना की मौत से आप जितना भागो, कही ना कही उससे मुलाकात हो ही जाती हैं।

किस्सें कहानियां तो ठीक हैं, पर असली जिंदगी मे हम शायद ही कभी मौत का सोचते हैं। हम अपनी परेशानियों, बेबसी, बुरा वक्त, और गंदी किस्मत के तामझाम में इतने व्यस्त होते हैं कि शायद ही हम कभी ईश्वर को जिंदगी के लिये धन्यवाद देते है कभी। काम को कल पर टालने की आदत तो हमारी होती ही हैं और हम बड़े ही निश्चिंत होते है कि कल हम स्वस्थ रहेंगे, कुशल रहेंगे और काम खत्म कर देंगे। हमें जिंदगी बोझ लगती है, अन्याय लगती है, अपना जीवन बेकार और दुसरों का अच्छा लगता है। हम कालेज के नाम से या कालेज में अपने परिणाम से खुश नहीं होते। अच्छे कालेज या नौकरी ना मिलने की शिकायत होती है। अमीर घर में ना पैदा होने से लेकर लंबा कद ना होने की शिकायत, अच्छे पति से शादी ना होने की शिकायत से लेकर ससुराल अच्छा ना होने की शिकायत । हमें जिंदगी से बस शिकायत ही होती हैं पर ना जाने क्यूँ हम ये भुल जाते है कि जिंदगी का एक ही विकल्प है और वो है मौत । एक मौत ही हैं, जो आपको हर शिकायत हर समस्या से मुक्ति दे सकती है, वरना जब तक जीवन हैं, परेशानियां रहेंगी, कठिनाइयाँ होगीं, मुश्किलें मिलेगी । आप पर निर्भर करता है आप सब हँसते हँसते सहे और अपना रास्ता बनायें या फ़िर हर किसी पर दोषारोपण कर एक नकारात्मक व्यक्ति की पहचान बनायें।

जिंदगी सच में बहुत ही जटिल और अनिश्चित हैं, किसी भी पल कुछ भी हो सकता हैं तो हमे जिंदगी का मूल्य जान इसे बरबाद करने की आदतों को छोड़ना चाहिये। रोज सोने से पहले एक बार सोचे जरूर की आज आपने ऐसा क्या किया जो आगे जाकर आपको काम आयेंगा। हर पल को जिये, और शुक्रिया अदा करें क्योंकि आपकी जिंदगी हालाँकि उतनी अच्छी नहीं जितनी आप चाहते हो, पर उतनी बेकार भी नहीं जितना आपके दुश्मन चाहते हैं। और अच्छे लोगों के साथ मधुर संबंद्ध हमेशा बनाये रखे और आगे बड़ कर रिश्तों को बनाये और बचाये रखने का प्रयास करे क्योंकि बुरा वक्त आने पर आपके करीबी और अजीज लोग ही आपकी मदद करेंगे दिखावटी लोग नहीं । जाते जाते गुलजार की कविता के साथ आपसे विदा लेता हुँ।

मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे

 दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
 ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

Friday, August 29, 2014

भीड़ भरी इन राहों पर चलते-चलते

भीड़ भरी इन राहों पर चलते-चलते
कभी हमनें खुद को बहुत अकेला पाया
अपने सपनों का बोझ ढोते-ढोते
कदमों को हर कदम लड़खड़ाता पाया

सपनों को हकीकत बनाने की चाह में
हकीकत को खुद से जुदा पाया
ख्वाब-ख्वाब रह गये, हौंसले यूँ ढह गये
तन्हाइयों में अश्रुओं को निर्झर बहता पाया

महलों में बसने की चाह में
अपने आशियें को कुछ उजड़ता पाया
जो निकले थे सफ़र पर मंजिल पाने
खुद को अब अपने घर से जुदा पाया

नींद तो बहुत थी आँखों में
‘बस कुछ रात और’ सोच खुद को बहलाया
अभी तो मेहनत करने का वक्त हैं
यह सोच कर रोज-रोज खुद को जगाया

अब जब कुछ ख्वाब टुटे है
तो उनकी किरचों को खुद में चुभाया
खुद के ही सपनों से जो हार बैठे
तो हर दर्द को अब खुद में समाया

जमाने की हँसी तो सुन ही रहे थे
अपनी उँगली को भी खुद पर उठाया
गुनाह चाहे किसी का भी हो
दोषी तो हमने खुद को ठहराया

क्यों हम ये भूल बैठे
कि जिंदगी एक ठहराव नहीं
यह एक पड़ाव नहीं
इसमें कोई बिखराव नहीं
यह तो एक बहती सी दरिया है
हर हार कुछ सीखने का जरिया है
क्यों थक बैठें कुछ ठोकरों पर
लंबी मगर खुशनुमा यह डगरिया है

हर हार कुछ सीखा जाती है
थोड़ा दुख तो थोड़ा तजुर्बा दे जाती है
भीड़ में खुशियॉ ना मना पाये तो क्या
कुछ दोस्तों को ही करीब ले आती है

वक्त यें हताश होने का नहीं
खुद से निराश होने का नहीं
माना बड़ी है ये मायूसियाँ
खुद को खुद से खोने का नहीं

हे उजला सवेरा हर काली रात के बाद
हे इन्द्रधनुष घनघोर बरसात के बाद
जरा संयम रखना कुछ देर और
हे जीत ही जीत कुछ मात के बाद

अपने हौंसलो की लो को
अविश्वास के थपेड़ों से बचाये रखना
अपने अत:मन की गहराइयों को
उम्मीदों की किरण से जलाये रखना

हम तो लंबी यात्रा के मुसाफ़िर है
ये चंद थपेड़े क्या हमें डगमगायेंगे
एक दिन हमारे हौंसलो की मशाल से
हमारे हर एक रास्तें जगमगायेंगे







Thursday, December 20, 2012

एक घुटी हुई चित्कार


बचपन में भूतों और राक्षसों से बड़ा डर लगता था। एक बार एक पत्रिका में एक भयानक राक्षस की तस्वीर देखी जो एक मासूम असहाय लड़की पर झपट रहा था और उसकें नीचे लिखा था ‘बलात्कार’ । मैं डर गया, दिल की धड़कन तेज हो गई, सांसे जोरो से चलने लगी, वो पत्रिका मेरी सबसे भयावह कल्पना की वास्तविक्ता का प्रमाण दे रही थी। माँ ने फ़िर समझाया, भूत राक्षस कुछ नहीं होते, वो तो किसी और चीज के बारे में लिखा है, मुझे वो पूरा लेख पढाया गया जो कि मुझे रत्ती भर भी समझ नहीं आया पर मैं खुश था कि भूत राक्षस नहीं होते पर आज एहसास हुआ कि माँ गलत थी, बहुत ज्यादा गलत । वो राक्षस सदियों से है और अब वो इतना भयावह और विशालकाय हो चुका है कि उसके अस्तित्व को झूठला कर खुद को सुरक्षित होने का दिलासा देना ढोंग के अलावा कुछ न होगा।

इंसान की, खास कर हम भारतियों की मूल प्रवत्ति होती है कि किसी भी दुर्घटना के प्रति संवेदना जताते समय हम ये कभी नहीं सोचते या कहे की ये नहीं मानते कि वो चीज हमारे साथ भी हो सकती है । ‘तमाशा’ एक राष्ट्रीय शगल बन चुका है और हम तमाशबीनों को मनोंरजन के दूसरे साधनों से ये त्वरित उत्तेजना और आवाज उठाने के दिखावे में ज्यादा मजा आता है या यूँ कहे कि आदत हो चुकी है। ‘आम आदमी’ के आवरण में हमनें बहुत अच्छे तरीके से अपनी जिम्मेंदारियों से मुँह मोड़ लिया है, खुद के नाकारापन को कमजोरी का बहाना और दायित्व को जिम्मेदारियों और व्यस्तता का बहाना बना कर टाल दिया है।

ये सब कुछ लिखते हुये मुझे खुद के दोगलेपन का भी एहसास है। इस विषय पर बहुत समय से लिखने की ईच्छा थी पर कभी आलस के कारण तो कभी इस डर के कारण की इस उम्र में इतने गंभीर विषय पर लिखा तो लोग क्या सोंचेंगे लिख नहीं पाया। आज लग रहा है कि आवाज उठाओं चाहे कोई ना सुने पर मन में ये अपराधबोध तो नहीं रहेगा कि हमने कुछ ना करा। कुछ निराशावादी और हर चीज को तर्क में तोलने वाले लोग कहेंगे कि कुछ लेख लिख कर या फ़ेसबुक पे ‘स्टेटस’ डाल कर क्या पा लोंगे। काश वे समझ पाते की बदलाव की शुरुवात एक आवाज से ही होती है और अगर वे कुछ नहीं कर सकते है तो कम से कम दूसरों की टाँगे खींचना और हतोत्साहित करना तो बंद करें।

ये आक्रोश ये तमाशा ये अनिंयत्रित विचार, ये बेबसी, ये मजबूर और कमजोर होने का अहसास कुछ नया नहीं है। गोवा का स्कारलेट केस याद आता है, जहाँ 15 साल की बच्ची के साथ हुई बर्बरता और क्रुरता को चंद तार्किक लोगो ने यह कह कर झुठलाया था कि उसका और उसकी माँ का चाल चलन ठीक नहीं था। क्या किसी इंसान से इंसान होने का अधिकार छीन लिया जायेंगा अगर वो समाज के कुछ पैमानों पर खरा नहीं उतरता ? गाँव के वे किस्से याद आते है जहाँ महिलाओं को डायन करार दे उनके साथ पाशविक व्यव्हार किया जाता है। किस्से तो बहुत है पर इंसाफ़ की मंजिल तक कितने पहुँचे नहीं पता। कितनो ने एक कड़ा संदेश दिया समाज को नहीं पता ।

अभी कड़ी सजा पर जोरो से बहस चल रही है जो कि चलती आयी है। एक और किस्सा आता है जब एक नर्स ने इच्छामृत्यु की याचिका दायर की थी क्योंकि वो सालों से विशिप्त थी शारीरिक रूप से, ना बोल सकती थी ना ज्यादा हिल सकती थी। उसी के अस्पताल के एक कर्मचारी ने ज्यादती की थी उसके साथ । उसे 7 साल की सजा हुई, सजा काट कर वो बाहार आया, नौकरी की, शादी की और एक सामान्य जीवन बिताया जबकी उस बेकसूर को बिना किसी बात की ताउम्र सजा हुई, उसका अपराध सिर्फ़ एक महिला होना था जो कि लोगो की सेवा कर रही थी।

‘लाभ के पद’ का विधेयक हो या फ़िर ‘ वेतन वृद्धि’ , ‘ आरक्षण’ का मसौदा हो या फ़िर कोई और निजी राजनितिक हित, हमारी पूरी संसद एक खड़ी नजर आती है। कोई हंगामा नहीं कोई हल्ला नहीं, समाज के सबसे संभ्रात वर्ग होने का दिखावा बड़ी खूबी से करते है हमारे राजनेता। पर कड़े कानून की बात हो या 33% महिला आरक्षण की, सब बटे नजर आते है। समाजवादी होने का दावा करने वाले एक नेता कहते है कि हम नहीं चाहते की सदन में लिप्स्टिक लगाये औरते आये। क्या औरतो की पहचान सिर्फ़ मेकअप करने और सजने सँवरने से है ? उनकी प्रतिभा, मेहनत और दिमाग का कोई मोल नहीं ? पड़ोसी देशों को पिछड़ा, दकियानूसी , संकीर्ण कहने वाले हम दोगले लोग यह भूल जाते है कि वहाँ पर सियासत मे महिला प्रतिनिधियों की संख्या हमसे कई ज्यादा है।

लोग सख्त कानून की माँग कर रहे है, पर क्या वो लागू हो पायेंगे ? और क्या फ़िर हम उनका दुरपयोग होने से बचा पायेंगे ? जरुरत सोच में बदलाव की है, कानून में नहीं। हमारी न्याय व्यवस्था की बुनियाद ही यहीं है कि सौ गुनहगार बच जायें एक बेकसूर को सजा ना हो । बेकसूर का तो पता नहीं पर सौ गुनहगार हर बार बच जाते है। निचली अदालत से उच्च न्यायलय फ़िर सर्वोच्च न्यायालय व्यक्ति न्याय की आस ले कर सालों चप्पल घिसता है, जो गिने चुने को न्याय मिलता है वो फ़िर राष्ट्रपति की दया याचिका का इंतजार करते है, और जैसा की प्रतिभा पाटिल ने किया था, अनेक बलात्कारी छुट कर समाज को मुँह चिड़ाते है। रुचिका कांड में परिजनो ने अंततः हार मान ली पर राठौर की हँसी आज भी एक डरावने सपने की तरह सताती होगीं उन्हें।

हम भारतीय यूँ तो लाख अपना गुणग़ान कर ले, विदेशियों को सौ गाली दे दें कि उनमें भावनाये नहीं, मान सम्मान संस्कृति नहीं, वो सिर्फ़ भौतिक सुखों के लिये जीते है, पर हमारी मर्यादा, पैमाने, अभिमान सब खोखले और झूठे है। घर से निकलते हुए माँ बाप बच्चे को यही बोलते है, “ बेटा किसी से लड़ाई झगड़ा मत करना, किसी दूसरे के पचड़े में मत पड़ना, अपने काम से मतलब रखना और चुप रहना” । क्या अपराधों में बढोतरी का कारण माँ बाप की ये सोच नहीं, पर वो भी क्या करे, उन्हें अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता है, वक्त आने पर ना समाज साथ देता है ना व्य्वस्था।

थोड़े दिन पहले ही कुछ दोस्तों से जो सभी लड़किया थी इस विषय पर चर्चा हुई थी, उनका मत था की इन सब से बचने के लिये लड़कियों को रात को बाहर निकलना ही नहीं चाहिये। क्या दिल्ली मे हुई घटना की जिम्मेदार ये लड़कियाँ नहीँ जो अपनी सुरक्षा के लिये अंदर ही रहती है और दूसरी लड़कियों को अकेले छोड़ देती है भूखे भेंड़ियों के बीच । क्या दिल्ली के वहीं रास्ते और वही बस अगर महिलाओं से भरी रहती तो क्या कोई बदचलन जरा भी गुस्ताखी करने की हिम्मत कर पाता। क्या लड़किया थोड़े समय के लिये भी खुद को कमजोर ना मान रास्तों पर निकले तो उनकी इतनी तादाद देख कोई भी उन पर उँगली या आँख उठा पायेंगा?

मेरे इस मत से शायद बहुत लोग सहमत ना हो पर मुझे यही लगता है कि समाज या कानून का मुँह ताकने के बजाय महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। और सिर्फ़ खुद के लिये ही नहीं हर उस महिला के लिये आवाज उठानी होगी जिसके लिये रात को निकलना एक मजबूरी है। जैसे नाना पाटेकर एक फ़िल्म में एक मदद को पुकारते बच्चे को जुल्म करने वाले पर पत्थर मारने को कहता है वैसे ही पत्थर महिलाओं को खुद को ही उठाने होंगे और मारने भी होगे।
क्या गुनहगार वो फ़ेयर एड लवली का विज्ञापन नहीं जो ये दर्शाता है कि महिला सिर्फ़ उनकी क्रीम लगा कर ही आत्मविश्वास प्राप्त कर कुछ बन सकती है ? क्या गुनहगार वो भीरू दोरूपी लोग नहीं जो लड़कियों के साथ हुये दुराचार के लिये उनके कपड़ो और चाल चलन को ठहराते है ? क्या गुनहगार वो फ़िल्म नहीं जिसमे महिलाओं को बस ग्लेमर की गुड़िया की तरह परिभाषित करते है ? क्या गुनहगार वो माता पिता नहीं जो अपनी बेटी कि सुरक्षा का सोच दूसरों की बेटियों के बारे में भूल जाते है ? क्या गुनहगार वो समाज नहीं जो ढकोसलों और कायदे कानूनों से कभी ऊपर नहीं उठ पाया ना ही उठ सकता है ? क्या गुनहगार वो इतिहास नहीं जहाँ राजपूत महिलाओं को इज्जत बचाने के लिये लड़ने के बजाय गौहर पर मजबूर किया जाता था। सवाल कई है, पर जवाब किसी के पास नहीं और ना ही कोई जवाबदेह है।

बलात्कार भी एक तरह का आतंकवाद ही है, जो मजहब के नाम पर नहीं वरन लिंग के नाम पर है। नसरुद्दीन शाह एक फ़िल्म में कहते है कि आम आदमी जब भी कुछ ऐसा घटता है तो दो चार दिन चैनल पलट लेता है और शुक्र मनाता है कि चलो हम बच गये। कब तक हम अपनी बारी का इंतजार करेंगे ? कब तक हम डर कर छुप कर, रात को नहीं निकलना, यहाँ अकेले नहीं जाना कह कर महिलाओं के अधिकार और ईच्छा दोनों को मारेंगे। वक्त आवाज उठाने का है, जो चिंगारी अभी जली है उसे शमा बना कर हर समय प्रज्वलित करने का है वरना हमारी याददाश्त इतनी कमजोर है खुद के घावों को ही भूल जाते है तो अभी दूसरों के घावो पर मरहम लगा क्षणिक रुदन करने का क्या फ़ायदा। 

दिल्ली में अविश्वसनीय ईच्छाशक्ति और साहस दिखाती उस मासूम की घुटी हुई चित्कार से जागे समाज की आँखे कब तक खुली रहेंगी ये तो वक्त ही बतायेंगा । मेरा उद्देश्य किसी को आहत करना या कोई विवाद पैदा करना नहीं वरन एक चिंतन की जरुरत दर्शाने का है, कहने को बहुत कुछ है पर ना शब्द बचे है अब ना कोई जरीया बस ये कह कर अपनी बात समाप्त करुँगा ।


कब तक खोंखले आँसू बहायेगा ये समाज
कब तक अपनी अकर्मण्यता पर मुस्कायेंगा ये समाज।
गुनाहगार तो बेधडक कर चले अपनी करतूतें
कब तक मासुमों को कटघरे मे लायेगा ये समाज ॥







Thursday, December 29, 2011

जिंदगी से जरा औपचारिकता हटाइये

जिंदगी से जरा औपचारिकता हटाइये
जिंदगी में जरा ड्रामा भी लाइये।
सांस तो सभी ले रहे है यहाँ
एक रोज जीने में जिंदादिली भी आजमाइये॥

कभी रसोई में खट रही माँ के पास भी जाइये
अच्छे भोजन का आभार भी जताइये।
स्वाद तो माँ के प्यार का होता है
एक रोज खाने के वक्त सिर्फ़ खाना न खाइये॥

कभी थके हारे पिता के लिये थोड़ा पानी भी लाइये
व्यस्त जीवन का थोड़ा वक्त पिता के साथ भी बिताइये।
डरते तो रोज है पिता की डाँट से
एक रोज जरा सम्मान भी जताइयें॥

कभी बुजुर्गो के साथ आराम भी फ़रमाइये
थोड़ा उनकी सुने कुछ अपनी बतियाइये।
इंतजार रहता है साथ का किसी के उन्हें
एक रोज जरा आशीर्वाद भी पाइये॥

कभी अपने गुरुओं के पैर भी छुकर आइयें
अपनी सफ़लता में उनका योगदान भी बताइयें।
किताबी ज्ञान तो हर कोई देता है
एक रोज जरा मार्गदर्शन भी पाइये॥

कभी अपने यार के कंधे पर सर भी टिकाइये
अपने जीवन में उसका महत्व उसे समझाइये।
हँसना हँसाना रोना रुलाना तो हर वक्त चलता है
एक रोज अपनो से जरा आत्मियता भी बड़ाइये॥

कभी थोड़ा वक्त खुद के साथ भी बिताइये।
दूसरों की तीमारदारी छोड़ खुद को भी आजमाइयें।
बहुत रो लिये दुसरो के गमों में
एक रोज अपने घावो पर भी जरा मरहम लगाइयें॥

Thursday, September 1, 2011

कुछ इस तरह से..............

कुछ इस तरह से दिल में मेरे दस्तक दी तुमने।
न आहट हुई, न सरसराहट हुई।
बस खामोशी में एक रुमानियत का अहसास हुआ॥

कुछ इस तरह से तुम्हारे मेरे जीवन में आगाज हुआ।
न अंदाजा था, न अंदेशा था।
बस तन्हाई के स्याह अधेंरे में रोशनी का अहसास हुआ।।

कुछ इस तरह से मेरे जीवन में रंग भर गई तुम्।
न आभास था, न कयास था
बस बेरंग जीवन के हर हिस्से में जीवटता का अहसास हुआ।

कुछ इस तरह से मन की गहराईयों में उतर गई तुम्।
न अनुमान था, न अभिसार था
बस निष्प्राण मन में चंचल तरंगो का अहसास हुआ।।

कुछ इस तरह से जुदा हो गयी तुम मुझसे
न समझ पाया, न संभल पाया
बस अंदर ही अंदर कुछ टुटने का अहसास हुआ।

कुछ इस तरह से मुझे किनारे कर गयी तुम
न डुब पाया न उभर पाया
बस मध्य मंझदार साहिल की अप्राप्ति का अहसास हुआ

कुछ इस तरह से तुम्हारी यादें संजोये हुँ
न कारण है, न निवारण है
बस पतझड़ में एक गुलशन का निशा भर है॥

Saturday, July 2, 2011

संशय और संघर्ष

निकला था जब डगर पर
द्र्ढनिश्चय और विजय की प्रतिज्ञा कर
आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति से सुस्जित
जिगर मजबूत,मन तैयार करने जीत सुनिश्चित

राह के मध्य ही लड़खड़ाये कदम
थमे पग लगे सब छ्द्म्म
बीच मझदार ही अटकी नैया
दिखे न साहिल, क्या करे खैवय्या

तपे तन, मायूस मन गया चैन
घबराया दिल, दिमाग सुन्न, अश्रुपर्वित नैन
बीच राह ही छोड़ी आशा
मन मस्तिष्क चहु और निराशा

सोचा फ़िर हारने से पहले ही
क्यो मान लूँ हार
है जान जब जिगर में
करता रहुँ तब तक वार

ना पलट सकता अब मैं
सफ़र के इस मोड पर
क्यों ना लगा दू पुरी ताकत
शायद पहुँच जाउँ उस छोर पर

बीच में भागने पर क्या मिलेगा
लो ठान तो पहाड़ भी हिलेगा
हारने से तो अच्छा कोशिश करना
पहले ही क्या हार से डरना

क्यो न भीड़ जाऊँ पुनः जीजान से
क्यो न जुट जाऊँ पुन: ठान के
क्यों न करु कोशिश सच्चे मन से
क्यो न चलू पुनः खुद की ताकत जान के

बढाये पग जैसे ही कुछ दुर
लौट आया चेहरे का नूर
दिखी मंजिल चंद कदमो पर
झूम उठा शरीर का अंग हर

पहुँचा जब अपने गंतव्य
लगा सफ़र ही था भव्य
सिखा दोबारा उठना , चलना और लड़ना
और धारा के विपरीत बहना